NewsFlash India
🔴 BREAKING NEWS • LIVE UPDATES FROM INDIA
Daily News2/6/2026157 views

धारा 127 CrPC पर बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: एकमुश्त भरण-पोषण के बाद भी पत्नी मांग सकती है राशि बढ़ाने का अधिकार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने अहम फैसला देते हुए कहा है कि पत्नी एकमुश्त भरण-पोषण लेने के बाद भी भविष्य में राशि बढ़ाने की मांग कर सकती है। जानें CrPC धारा 127 से जुड़ा पूरा मामला।

धारा 127 CrPC पर बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: एकमुश्त भरण-पोषण के बाद भी पत्नी मांग सकती है राशि बढ़ाने का अधिकार

धारा 127 CrPC पर बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, एकमुश्त भरण-पोषण के बाद भी पत्नी मांग सकती है बढ़ोतरी

नई दिल्ली: भरण-पोषण से जुड़े मामलों में बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी ने पहले किसी आदेश के तहत एकमुश्त भरण-पोषण राशि स्वीकार कर ली हो, तब भी वह भविष्य में भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग करने का अधिकार रखती है। इस फैसले को महिलाओं के आर्थिक अधिकारों की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

कोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दी गई एकमुश्त राशि स्थायी समाधान नहीं मानी जा सकती और इसकी वैधता सीमित अवधि तक ही रहती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का उद्देश्य जरूरतमंद व्यक्ति को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है और बदलती परिस्थितियों के अनुसार इसमें संशोधन किया जा सकता है।

कोर्ट ने क्या कहा

न्यायमूर्ति अभय एस. वाघवासे की पीठ ने पति द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि कानून के अनुसार एकमुश्त भरण-पोषण भुगतान अधिकतम पांच वर्ष की अवधि तक लागू माना जा सकता है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि समय के साथ परिस्थितियों में बदलाव आता है, जीवन-यापन का खर्च बढ़ता है या पत्नी की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है, तो वह भरण-पोषण राशि में वृद्धि की मांग कर सकती है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि भरण-पोषण से जुड़े मामलों में न्यायालय को सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखना चाहिए।

फैमिली कोर्ट के आदेश को दी गई चुनौती

इस मामले में फैमिली कोर्ट ने जुलाई 2025 में पत्नी की भरण-पोषण राशि को 2,000 रुपये से बढ़ाकर 6,000 रुपये प्रति माह करने का आदेश दिया था। अदालत ने बढ़ती महंगाई और पत्नी की आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया था।

पति ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। पति का तर्क था कि पत्नी पहले ही एकमुश्त भुगतान स्वीकार कर चुकी है और उसे आगे बढ़ोतरी की मांग का अधिकार नहीं होना चाहिए।

हालांकि हाईकोर्ट ने पति की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि एकमुश्त भुगतान भविष्य की सभी परिस्थितियों को कवर नहीं कर सकता और जरूरत पड़ने पर पत्नी को राशि बढ़ाने का अधिकार रहेगा।

धारा 127 CrPC का महत्व

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 127 भरण-पोषण से जुड़े मामलों में संशोधन का प्रावधान देती है। इस धारा के तहत यदि किसी पक्ष की आर्थिक स्थिति में बदलाव होता है, तो अदालत भरण-पोषण राशि में बदलाव कर सकती है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रावधान उन महिलाओं और आश्रित व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण है जो समय के साथ बदलती परिस्थितियों के कारण अतिरिक्त आर्थिक सहायता की जरूरत महसूस करते हैं।

महंगाई और जीवन स्तर को भी माना गया आधार

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि महंगाई, स्वास्थ्य खर्च, आवास, शिक्षा और दैनिक जरूरतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे में भरण-पोषण की राशि तय करते समय इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है।

कोर्ट ने कहा कि यदि भरण-पोषण की राशि वर्तमान जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं है, तो उसमें संशोधन किया जाना न्यायसंगत माना जाएगा।

महिलाओं के अधिकारों के लिए अहम फैसला

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य जरूरतमंद व्यक्ति को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है। इसलिए परिस्थितियों में बदलाव होने पर राशि में संशोधन करना उचित माना जाएगा।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला महिलाओं के आर्थिक अधिकारों को मजबूत करने वाला माना जा रहा है और भविष्य के मामलों में यह एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

इस फैसले से उन महिलाओं को राहत मिल सकती है, जिन्होंने पहले किसी समझौते या अदालत के आदेश के तहत एकमुश्त राशि स्वीकार की थी, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में उन्हें अतिरिक्त आर्थिक सहायता की आवश्यकता है।

भविष्य के मामलों पर पड़ सकता है असर

विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का असर आने वाले कई मामलों पर पड़ सकता है। इससे अदालतों को यह स्पष्ट दिशा-निर्देश मिलेगा कि भरण-पोषण से जुड़े मामलों में समय-समय पर समीक्षा करना आवश्यक है।

यह फैसला सामाजिक न्याय और महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे उन महिलाओं को न्याय मिलने की संभावना बढ़ेगी, जो आर्थिक रूप से निर्भर हैं और बदलती परिस्थितियों के कारण अतिरिक्त सहायता की जरूरत महसूस करती हैं।